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मेरे अल्फाज़

मुस्कुरा कर चल दिए

Rashid Ameen

3 कविताएं

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बात जो रोने की थी उस पर तो रोना था तुम्हें
तुम तो हर इक बात पर ही मुस्कुराकर चल दिए

हक़ बयानी से बहुत दुश्मन बना ड़ाले मगर
बात जो कहनी थी हम को कह कहाकर चल दिए

तुम से पहले ज़िंदगी मेरी बहुत तारीक थी
तुम जो आए ज़िंदगी को जगमगा कर चल दिए

मेरी हिम्मत देख कर के जंग के मैदान में
जितने भी दुश्मन थे मेरे थर थराकर चल दिए

दुश्मनों को छोड़िए जी दोस्त भी अपने नहीं
वह भी अपनी जग हँसाई कर कराकर चल दिए

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