जीवन-मृत्यु

                
                                                             
                            मृत्यु के चंद छंद, सुना गए
                                                                     
                            
सार पूरे जीवन तंत्र का
कर लो चाहे जतन कितने,
जीवन में रहो चाहे मगन जितने,
एक ही पल का होता है अंतर बस
पल में जीवन पल में मौत
है खेल बस कुछ रस्मों का
रिश्ता मन का, रिश्ता तन का,
कोई कभी लगता बस अपना है
कभी कोई रिश्ता, लगता अधूरा सा
पल में हो जाता बेमानी सा सब
लगता सबकुछ व्यर्थ सा तब,
बेकार का प्यार, बेकार की नाराज़गी
हो या न हो कोई राज़ी,
चलती रहे साँसें जबतक,
बहती रहे धारा प्रवाह सी
ये जिंदगी जब तक, देती रहेगी
कुछ सुलझे कुछ अनसुलझे से पल
कुछ इच्छायें कुछ शिकवे कुछ गिले
कभी आँखों में कभी आँखों से ओझल
फिर एक शांत सा सन्नाटा कहीं
के देता है स्थिर सभी कुछ
यही सब होता है दरमियान मौत और जीवन के
कभी उम्मींदे कभी निराशा बाँध ही लेती है
मन को बरबस जीवन के आँचल से जब
एक मृत्यु ही देती है हल सभी उलझनों का,
बस रह जाते हैं बिलखते रिश्ते कहीं,
तो कहीं अधूरी सी छूटी सी एक क्षुधा,
एक करुण रुदन तो विलाप कहीं
फिर एक घोर अकेली अँधेरी रात
घबराकर प्रतीक्षा करती जो भोर की,
जैसे फिर जीवन की दरकार का हो आलाप


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8 months ago

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