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मेरे अल्फाज़

बलात्कार की नृशंसता

Ranjana Patel

18 कविताएं

83 Views
कैसी है यह निर्ममता
जो न समझे इंसा को इंसा
कैसी है यह कमुकता
जो न समझे बच्चे को बच्चा.
कैसी है यह भौतिकता
जो तिल -तिल मर रही नित मानवता.

लुटता है निज चीर प्रभा का,
क्या होगा इस जग में सवेरा.
मिटता है निज मान शुभा का,
क्या होगा इस जग में उजेरा.

कैसी है तेरी आकूलता
जो न समझे अश्रु की पीड़ा
कैसी है यह भौतिकता
जो तिल-तिल मर रही नित मानवता

-रंजना पटेल

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