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मेरे अल्फाज़

जिंदगी

Ramkumar Mathur

85 कविताएं

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जिंदगी बस यूँ ही जा रही थी
पूछने पर वो मुस्करा रही थी
कुदरत ने मुझे दिया था उसका साथ
पर मैं कहीं और
वो कहीं ओर जा रही थी
बीच में हम दोनों के थीं, कुछ
वक्त की ऊँची दीवारें
जो थी उसकी नजर में
न थी, तो बस मेरी निगाहों में।
उसकी मुस्कराहटों पर
न हो सका था ये दिल निसार
और गुज़र गईं न जाने
कितनी बहारें।
जिंदगी बस यूं ही जा रही थी।
समझ न सका मैं
उसकी मुस्कराहट को
थी ,भी वो बहुत करीब
पर वो मुझे नज़र न आ रही थी।
जिंदगी बस यूं ही जा रही थी।
उसकी मुस्कराहटों में
मेरे छिपे थे कई राज
होता मुझे उन पर नाज़
जो होते उजागर
कल या आज,
क्यों वो मुझे कई बार
पास बुला रही थी।
जिंदगी बस यूँ ही जा रही थी

- राम कुमार माथुर

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