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मेरे अल्फाज़

गजल

Ramkumar Mathur

69 कविताएं

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ग़ज़ल

क्यों परेशाँ है ये इंसानो की बस्ती,
तमाशा ही तमाशा बिखरने लगा है।

हलचल अपना वजूद बताने लगी है,
हवा भी अब घबराने लगी है।

साँसों की आवाजें शोर कर रही हैं,
सन्नाटों को अब नींद आने लगी है।

क्यों इस कद्र फैला है अंधेरा,
रोशनी अब आने से घबराने लगी है।

तू फिक्र न कर ए खुदा के बन्दे,
उसके हुज़ूर में तेरी बन्दगी जाने लगी है।

इस बस्ती में फिर से फरिश्ते करेंगे बसेरा ए रकम,
उसकी मोहब्बत की बारिश अब होने लगी है।

-रामकुमार माथुर

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