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Gaon ka ghar

मेरे अल्फाज़

गांव का घर

Ramesh Vinodee

1 कविता

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घर... जहाँ घरवाले थे
भाई बहन मतवाले थे
रिश्ते नाते सब यहीं मिले
भांजे भान्जी भी यहीं पले
नन्हें नन्हें पंखों से
उड़ना यहीं पर सीखा
बड़े-बड़े सपनों में
रंग भरना यही पर सीखा
बापू के गुस्से सा कठोर
मां की गोद सा सरल है

दोस्तों ! ये मेरा गांव का घर है

ईंट-ईंट सा दिख रहा
याद-याद में टीस रहा
दरवाजा आज भी खुला है
ज्यों राह हमारी देख रहा
आये बारिश टपकता है
सर्दियों में ठिठुरता है
जब छोड़ा तो रोया था
आज क्रोधित सा लगता है
तब नहीं था ऐसा लगता
आज इसका जो हश्र है

दोस्तों ! ये मेरा गांव का घर है ।

थोड़ा अंदर जाओगे तो
एक खुला आँगन मिलेगा
दाएं हाथ रसोई में
मां होने का भ्रम लगेगा
लीपा पुता रहता था
जब यहाँ वो रहती थी
इसी आँगन और रसोई में
कितनी खुशियां बसती थीं
हर कोना फुलवारी था
आज यहां पतझड़ है

दोस्तों ! ये मेरा गांव का घर है 

बुआ शहर से जब आती थी
सबके मन को भाती थी
जादू का पिटारा खुल जाता
एक जोड़ी जूता मुझे भी मिल जाता
उस जूते में पंख लगे थे
पहन हवा में उड़ जाते
पहनने की आदत नहीं थी
कहीं निकाल भूल आते
आज भी मन के कोने में
उन जूतों का फिक्र है

दोस्तों ! ये मेरा गांव का घर है 

समय बीता सब कुछ बदला
ये घर वहीं पर अटल खड़ा
मां के साथ ही चला गया
बचपन होकर आज बड़ा
बड़े भाईयों के पास बाबूजी
बैठे शहर में खांस रहे
विनती है ईश्वर तुमसे
चलती उनकी साँस रहे
जिन्दा है उनसे ये घर
नहीं तो ये बस पत्थर है

दोस्तों ! ये मेरा गांव का घर है 

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