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मेरे अल्फाज़

मन की खिड़की खोलो

RAMESH SHUKLA

159 कविताएं

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।। मन की खिड़की खोलो।।

अपने मन की खिड़की खोलो,
ईश्वर की रचना संग हो लो,
रचे बसे, रचना से तुम भी,
रचना में सबसे तुम सुँदर।

तेरे लिये रचे, ईश्वर ने
सूरज,धरा,चाँद,तारागण,
नदियाँ, झरने, पर्वत, उपवन,
इन संग आनन्दित है तन मन।

अपने को भी तो पहचानो,
शक्ति रूप हो, तुम यह जानो,
ऊंचे इतने उठ सकते हो,
आसमान भी छू सकते हो।

तूफानों से भय ना खाओ,
ये तो आते जाते रहते ,
दृढ़ता से जीवन जीना है,
उसको ही जीवन कहते हैं।

कल का दिन देखा है किसने,
अपना एकाकी पन छोड़ो,
संग मिल कर गाओ हँस बोलो
आज सुनहरा पल है,जी लो।

नदियाँ मिल सागर बन जाते,
बगिया मिल उपवन कहलाते,
तारे मिल अम्बर छा जाते,
हम सब मिल जीवन महकाते।

बड़े भाग्य मानुष तन पाया,
अवसर ना होने दो ज़ाया,
संग मिल प्यार बाँटते, जी लो,
अपने मन की खिड़की खोलो।

रमेश शुक्ल 

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