आनन्द बोध

                
                                                             
                            बातों में अब कहाँ रही
                                                                     
                            
अपने पन की थी जो यारी
बुद्धि, ज्ञान की होड़ लगी है
नहीं रही दुनियादारी
जग के थे आदर्श मूल्य
उनका ना कोई अर्थ रहा
अहंकार की बेला है
सम्बन्ध मिटे ,परिवार ढहा

तन या मन मे कहाँ रहा
जो पहले था रस रंग संयोग
उम्र बढ़ रही चतुराई की
कैसे भी पा लें सब भोग
विष बेला चढ़ रही शीश
उलझन का ही है बना योग
चितवन कठिन समझ पाना
अब भाव शून्य ही हैं सब लोग

प्रश्नों की है झड़ी लगी
शब्दों का बिछा गहन है जाल
घेरे खड़ी समस्याएं सबको
समाधान को फिरें दलाल
झुका शीश चिंता चंगुल से
कर्मों का ही है यह भोग
अज्ञानी है जो ना समझे यह
शांति बसत आनन्द बोध

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 years ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
X