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मेरे अल्फाज़

आंखें

Ramesh chandra

190 कविताएं

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मौन हैं दिखने में, ये आंखें
पर कुछ कहती सी लगती हैं
अंतर में लिए कराह, कसक
नित सहती, हंसती रहतीं हैं,

ये मौन धर्म व्रत धरे हुए
अन्तस में वेदना भरे हुए
संताप के सागर लिए हुए
विष पान सदा ही किये हुए,

ये धैर्य न ख़ुद का खोने देंगी
तुमको अधीर ना होने देंगी
आकुलता दिल में दबी रहेगी
पर तुम्हे ना व्याकुल होने देंगी,

बोझ व्यथाओं का सह कर
तुमको ढोता ना, देख सकेंगी
अपने हिय में रिसते आंसू
ख़ुद पी कर, ये सहज दिखेंगी,

नित किन भावों संग डूबी रहती
कौन समझ पाया यह अब तक
हां जिस पर ये वार ग़र करती
कोई न बच पाया है अब तक,

कुछ कहते ये,दर्पण मन की
पर बात अलग है इन नैनन की
पढ़ लेने वाली, कम ही होतीं
भाषा अति इनकी मुश्किल होती,

जब अंतर मन की दबी वेदना
इन आंखों से झर कर बहती
तब अंजाम, डुबोना रहता
सागर से भी गहरी रहतीं

- रमेश शुक्ल

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