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Towards the unknown path

मेरे अल्फाज़

अंजान पथ की ओर...

RAMAYAN DHAR

3 कविताएं

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मैं चल पड़ा उस डगर पर,
जिगर पर पत्थर रखकर।
लगे जैसे भरे फूलों की
झोली पड़ी हो जिस पथ पर।
कभी आस तो कभी प्यास
बनकर सताती थी मुझे।
याद दिलाती थी मुझे
रूप बताती थी मुझे।
मैं सोया सोया निकल पड़ा उधर
जिधर भी नजर मेरी थी घूमती।
लगता था आज फिर से
घने मौसम में पंछी हो झूमती।
जब कभी खो जाता था मैं
उस रंग रूप की नई किरण में।
तब तब बनकर छाँव मेरी परछाई पर,
पहरा करती थी हर एक मिलन में।
आज मैं यह जानकर
आवाज अंतर्मन का सुना।
अपने ह्रदय के दिव्यरूप
वाणी को सोचा गुना धुना।
फिर लगा मुझे वो किरण
न थी केवल एक आस की।
थी कड़ी परीक्षा मेरी,
मेरे लग्न और विश्वास की।
पर जब नजर आया वो पथ
जिस पर चलना था मुझे।
मन कहा"आदर्श"
अब नहीं डरना तुझे।
मन के भावों के इस प्रवाह पर,
रख लो अपना ध्यान।
फिर जग पड़े आश्चर्य में,
हो कृतियों का सम्मान।
लें सीख,सबक,प्रतिशोध
अग्नि की ज्वाला सी।
बन जाओ एक काव्य-पाठ
बच्चन के मधुशाला सी।

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