आपका शहर Close
Hindi News ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Paheli

मेरे अल्फाज़

पहेली...

Ram Milan

1 कविता

7 Views
ये जिन्दगी भी कैसी अनबूझ पहेली है 
आँसू छलकें खुशियों में कभी पीर गीत बन जाये
चार कन्धों पे अर्थी है चार कन्धों पे डोली है

खुशियाँ न रूठ जायें इस गम में जी न पाये
कहिं गम के इक तिमिर पर बैठे जिन्दगी लुटाये
जिसे दोनों ही मन भाये उसकी नारि नवेली है

जीने की आरजू में मरा जा रहा है कोई
मरने की चाह लेके जिये जा रहा है कोई
जबकि मौत फकत इसकी निर्विवाद सहेेली है

एक सफ़र है अलबेला मंजिल निरी अनजानी
ये सारे संगी साथी चार कदम के हमराही
रिश्ते नातों के भरम में एक जान अकेली है

बिसराया आज को जो कल की तलाश में
हकीकत से परे जागती आँखों के ख्वाब में
मृगतृष्णा-मरीचिका-मरुथल सी अठखेली है

जिसने जैसे जिया इसको वैसे किया परिभाषित
कल आज और कल को इसने किया सुभाषित
ये अनजानी, अनदेखी, अविरल, अलबेली है

- राम मिलन प्रसाद

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Other Properties:

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree
Your Story has been saved!