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मेरे अल्फाज़

था गुलाबी सा मासूम चेहरा...

Ram Chandra

124 कविताएं

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था गुलाबी सा मासूम चेहरा तो सनम का

दिन होली का आया तो लाल पीला दिखा

जिसके मस्तक पे रहा चांद का था बसेरा

वहां बिखरा हुआ सबेरे का उजाला दिखा

***

क्या-क्या सनम ने कुछ चिट्ठियों में लिखा

उसी में ज़िंदगी का हर फलसफा ये दिखा

जंजाल शब्दों का हर कोई तो इसमें फंसा

फिर भी शब्दों का हर कोई दिवाना दिखा

***

क्रय हजारों में किया ये कौड़ियों में बिका

फिर भी तो ऐसा वो व्यापार करता दिखा

लोग कहते रहें ये हुनर सब में आता नहीं

प्यार में सबकुछ हमेशा तो जायज दिखा

***

ये दिल अपना तो और मेरे ही हवाले रहा

फिर दूसरों की नजर में क्यों घायल दिखा

आदमी का नजरिया सदा एक जैसा रहा

हर किसी को दूसरे में अपना जैसा दिखा

***

बातें आई बहुत सी यूं ही तो गुजरकर गई

रही जब बारी तुम्हारी मैं सोचता ये दिखा

बला की खूबसूरती थी ये तुम्हारी गली में

बावजूद इसके चार चांद मैं लगाता दिखा

***

- रामचन्द्र दीक्षित 'अशोक'



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