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मेरे अल्फाज़

मैं क्या -क्या भूलूं

Ram Chandra

100 कविताएं

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मैं क्या -क्या भूलूं क्या-क्या याद करूं
किस-किस से क्या-क्या फरियाद करुं

उन्नति उत्कृटों पे मीठा सा संवाद करूं
या अवरोहों पे हरदम वाद-विवाद करूं

आकर्षक मोहक रंग-बिरंगी पतवारें हैं
किस पर बैठूं किस से दरिया पार करुं

बाजार प्रबंधन रिश्तों का व्यापार करूं
तिनका-तिनका जोड़ू और अंबार करूं

दीवारों पर दीवारें उनका विस्तार करूं
ध्वस्त इन्हें कर देना खुला विचार करूं

सिरमौरों पर क्या अब भी मैं नाज करूं
जो बोल न पाते उनमें तो आवाज भरूं

खुले गगन में जा खुद को आजाद करुं
मिट्टी में रहना मिट्टी से ही मैं प्यार करूं

सीधा-साधा किस राह पर विश्वास करुं
मिल मुझे बताओ मैं कैसे अरदास करुं

पोथी पढ़-पढ़ दिल में दर्शन ज्ञान भरूं
मन का दीप जला अंदर उजियार भरुं

सब झूठ-मूठ इस पे क्यों एतबार करूं
सच पीहर का घर जाना है तैयार करूं

जैसा जो भी है वैसा प्रभु को पेश करुं
अर्थ नहीं कोई तरह-तरह का वेश धरूं

-रामचन्द्र दीक्षित 'अशोक'

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