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मेरे अल्फाज़

मधुआस

rakesh sagar

31 कविताएं

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कलियों ने भौरे से पूछा,
आओ जी क्या सुन रहे हो,
किसको नजरें ढूँढती हैं,
मन ही मन क्या धुन रहे हो,
किसको नजरों में बसाए,
घुमते पगडंडियों पर,
किस कली की आस में,
तुम मन ही मन कुछ बुन रहे हो।।

भौरे ने तब ये कहा,
ये प्यार की शुरुआत है,
खुशबू मिल जाए हमारे,
दिल में बस ये प्यास है,
प्यार में लिपटी शहद की,
बस्तियों को चुन रहा हूँ,
बस इसी उम्मीद के पल,
मन ही मन मैं बुन रहा हूँ।।

बेवफा हो तुम सुना है,
हर घड़ी मन बदलते हो,
मन ये चंचल है तुम्हारा,
हर कली पर मचलते हो,
रूप के सौंदर्य का रस पी,
लगा है झुम रहे हो,
किसको नजरें ढूँढती हैं,
मन ही मन क्या धुन रहे हो।।

मिलन का ठहराव इस,
बगिया में होगा तय हुआ था,
प्रेम का पथ था सुसज्जित,
प्रेममय हर पल हुआ था,
प्रेम से मैं प्रेम का रस पी,
जहाँ में घूम रहा हूँ,
प्यार में लिपटी शहद की,
बस्तियों को चुन रहा हूँ।।

राकेश कुमार पाण्डेय"सागर"
आज़मगढ


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