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मेरे अल्फाज़

घनश्याम गंजा

Rakesh Kumar

6 कविताएं

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घनश्याम गंजा 

एक ऐसी कविता लिखूं, जो काली घटा के नाम हो।
मेरी काली-काली जुल्फ़ें, जब झुकें तो शाम हो।

बिसरे दिन याद आते हैं, जो बीत गये तनाव में।
अच्छी खासी आबादी थी, इस उजड़े से गांव में।
हर एक जन्तु को लगता था, जैसे चक्का जाम हो।
एक ऐसी कविता------

मुझे अपनी जुल्फ़ें लहराने का , मौका नहीं दोबारा मिला।
अपने जी को यूं समझाया चलों जुओं से छुटकारा मिला।
अब कंघी, शैम्पू, तेल का, चाहे कुछ भी दाम हो।
एक ऐसी कविता------

मैं आज तक भूला नहीं, वो सावन की बहारें याद हैं।
महसूस होता है जैसे, जुल्फ़ों से सिर आबाद है।
कौन जाने इस आबादी की, कब सुबह कब शाम हो।
एक ऐसी कविता------

हमें लहरों से नहीं शिकायत, धोखा दिया किनारों ने।
हम बचपन से ऐसे ना थे, लूटा हमें बहारों ने।
मैं तो अब भी कोशिश करता हूं, सिर फिर से घनश्याम हो।
एक ऐसी कविता------

हमारे युवा गन्जों की तो, हालत और भी खस्ता है।
शादी करना बहुत ही मुश्किल, कुंवारा रहना सस्ता है।
हर ससुर की यही मांग है, दामाद नौजवान हो।
एक ऐसी कविता------

हम युवा बुजुर्ग समाज में सम्मान बड़ा ही पाते है।
समाज में लोग हमें, बड़ा धनवान बताते हैं।
छः-छः महीने तक तो हम, बाल नहीं कटवाते हैं।
डाई शम्पू है बात दूर की, हम तेल तलक नहीं लगाते हैं।
सूखी चम्पी करके हाथ से हम चन्दा चमकाते हैं।
जाने कैसे – कैसे करके हम दो पैसे बचाते हैं।
इसी बचत से शायद बैंक में खाता अपने नाम हो।
एक ऐसी कविता------

श्रोताओं , बढती उम्र के आगे मानों, सब कोशिशें हारी हैं।
बीता कल हमारा था, आज तुम्हारी बारी है।
हम सबकी इस हंसी-खुशी में, टेन्शन का ना काम हो।
एक ऐसी कविता------

राकेश कुमार 

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