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मेरे अल्फाज़

अपने हिस्से तो सोने को जमीन और ओढ़ने को आसमान है

Rajnish Pandey

3 कविताएं

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मेरी कलम से.....

बस अपने ही रुख और रफ्तार में जिंदगी चलती जा रही है,
जो चाहूं कि मिले वो बस उम्मीदों में फड़फड़ा रही है।

उम्मीदों से भरी कि हर कोशिश हो रही लहूलुहान है।
अब तो ये हालत है जिंदगी भी हैरान, वीरान और परेशान है,

अपने अंदर का जानवर ही बच गया है मर गया इंसान है।
अपने हिस्से तो सोने को जमीन और ओढ़ने को आसमान है।


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