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हुक्के की धुंद में

मेरे अल्फाज़

हुक्के की धुंद में

Rajni kapoor

21 कविताएं

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हुक्के की धुंद में
हुक्के की धुंद में, आवाज़ों के शोर में
मैंने कुछ युवाओं को, बिगड़ते हुए देखा है

गुलाबी होंठों की, मरमरी सी मुस्कुराहट को
सिगरेट के कश में, उलझते हुए देखा है

मसालों की चर चराहट को, दातों के दर्मियां
इतनी आसानी से पिसते हुए देखा है

बाप के पैसों की, अय्याशियों का मंज़र
उस एक छत के नीचे, बिखरे हुए देखा है

माँ के आंसुओं को, शीशे के गिलासों में
हर रोज़ जामों की तरह लड़ते हुए देखा है

हुक्के की धुंध में, आवाज़ों के शोर में
मैंने कुछ युवाओं को बिगड़ते हुए देखा है।

- रजनी कपूर


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