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Hindi News ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   15 AUG 1947

मेरे अल्फाज़

तारीख थी पंद्रह सूरज था मस्त का

Rajkumar Tiwari

113 कविताएं

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जान अपनीं देके हमें, आजादी दिलाई
हिफाजत से इसे रखनें में है सबकी भलाई
जान अपनी देके हमें................

जंजीर पड़ी हाथ में बेंड़ी थी पांव में
दर्द बड़ा दिखता था हर एक गांव में
जब जुल्म की जंजीरे हदें पार कर गईं
तब बीर सपूतों ने यहां क्रांती थी लाई
जान अपनी देके हमें................

दर्द के सागर में सारा देश था डूबा
जुल्मोंसितम से यहां का बच्चा था ऊबा
कसम यहां खा के कफन सर पे था बांधा
सभी ने यहां दांव पे जवानी थी लगाई
जान अपनी देके हमें................

जब तुमने आंख खोली सुहानी सुबह पाई
इस दिन के लिये कितनी जवानी थी गवांई
आजादी यहां पा के वो दलदल तो न भूलो
रौशन तुम्हें करने को चिताएं थी जलाई
जान अपनी देके हमें................

मां की कई कोख यहां कुर्बान हो गयी
कई मांग यहां मिटी वो जवान हो गयी
पूस की रातों में डूबा था वतन सारा
खिजा चली गई ऋतु बसंती दिलाई
जान अपनी देके हमें................

सन रहा सैंतालिस महीना अगस्त का
तारीख थी पंद्रह सूरज था मस्त का
उस दिन से (राज) करनें के दिन यहां आये
वो धन्य जवानी रही जिसने आजादी दिलाई
जान अपनी देके हमें................

राज कुमार तिवारी (राजबाराबंकवी)
Mo- 9984172782
#AzadAlfaz

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