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मेरे अल्फाज़

पूछ रहा हिमालय हमसे

Rajeshwari Joshi

10 कविताएं

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पूछ रहा हिमालय हमसे,
क्यों काटे तूने मेरे वन
होटल, रिसार्ट बनाकर,
क्यों उजाड़े मेरे उपवन.

सजग प्रहरी बना हमेशा,
तेरी रक्षा कर रहा.
इस सेवा के बदले मुझमें,
तू कूड़ा भर रहा.

मेरे घराटो को,
तूने क्यों तोड़ा.
नदियों पर बांध बनाकर,
क्यों धारों को मोड़ा.

बुरांशों को काटकर मेरे
क्यों चीड़ तूने लगाया.
पानी सुखाकर क्यों,
मुझे प्यासा बनाया.

जल, जंगल , जमीन को मेरे,
अगर नहीं बचाएगा.
सुंदर, स्वच्छ, हरा- भरा,
पर्यावरण कहां से पाएगा.

मुझे मिटाने चला अगर तू,
तेरा ही अस्तित्व मिट जायेगा.
फिर रोयेगा करनी पर अपनी,
केदारनाथ सी त्रासदी पायेगा.

मैं पर्वतमाला नहीं हूं सिर्फ,
मैं तेरा रखवाला हूं .
अपनी शुद्ध हवा, पानी से,
जीवन देने वाला हूं.

मैं स्वयं मैं हूं संतुलित,
संतुलित विकास चाहता हूं.
अपने सरल, मूक व्यवहार के बदले,
तेरा सरल प्यार चाहता हूं.

मुझको मान मित्र तू अपना,
तभी प्रदूषण मुक्त मैं हो पाऊंगा.
देवीय आपदा से मुक्त होकर,
तू भी ख़ुश रह पायेगा.



द्वारा राजेश्वरी जोशी
रा. उ. प्रा. वि. रतनफार्म न. 1
सितारगंज, (ऊ. सिं.नगर)
उत्तराखंड


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