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मेरे अल्फाज़

नदी अंतर्मन की

Rajeshwari Joshi

25 कविताएं

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बाहर की दुनिया से दूर इक,
नदी मेरे मन में बहती है.
क्या कहती है नदी उसे मैं,
सुनने की कोशिश करती हूँ.

बैठी इसकेे किनारे पर मैं,
अक्सर सोचा करती हूँ.
मृग कस्तूरी सी क्या खोज रही मैं
क्यों जंगल- जंगल भटकी हूँ.

जंगल में नही कस्तूरी वो,
मेरे अंदर ही बसती है
सुख की नदिया प्रबल वेग से,
निज अन्तर में ही बहती है.

कल- कल करते इसके स्वरों की,
मीठी ध्वनि में खो जाती हूँ.
खुश होकर फिर मन को अपने,
शीतल चाँदनी सा पाती हूँ.

दुनिया से थककर रेत में इसकी,
पैर धसाकर बैठ जाती हूँ .
मन को भारहीन सा कितना,
दुखों से मुक्त अपने को पाती हूँ .

- राजेश्वरी जोशी

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