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मेरे अल्फाज़

लम्हा

Rajendra Singh

65 कविताएं

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ये लम्हा
तेरे इन्तजार का
उस चाँद के
इस चाँद की खातिर
आजा
इस लम्हे को
जरा सा कैद कर लूं
पलकों में।

क्षुधातुर तू है
तो मैं भी हूँ
प्रीतातुर तू है
तो मैं भी हूँ
ये लम्हा
मेरे इन्तजार का
मेरी प्रतीक्षा का
जरा सा कैद कर लूं
पलकों में।

क्यूँ पड़ी है फेर में
उन सात जन्मों के
आ जा
जी ले इस लम्हे को
मेरे संग
मेरी प्रतीक्षा
आ जा
जरा सा कैद कर लूं
इस लम्हे को
तेरे संग
मेरी प्रतीक्षा ।।

- प्रभात

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