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मेरे अल्फाज़

यहां वहा इधर उधर...

rajendra sharma

8 कविताएं

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यहां वहा इधर-उधर
जाते हैं जिधर
सुनाई देता है
बस एक यही स्वर
कौनसी जाती कुल गौत्र के हो बन्धुवर!
सुनते ही मन की
सारी उमंगे तरंगे जाने कहा खो गई
निर्जीव सी हो गई
मन की चेतना कुछेक पलों लिए
टूटी जब तंद्रा तब चिंतन के द्वार पर खड़ी थी
एक एक वे सारी विभूतियां
जो हुए थे सिर्फ कर्म से महान
और यहां कुछ व्यक्तियों को
उनके कुल पुरुषों की उपलब्धियों का है गुमान
भले ही उनके द्वारा स्थापित आदर्शों का
जरा भी न हो भान
किन्तु यदा कदा यत्र तंत्र करते रहते हैं
उनका बखान
अरे भाई नवयुग ने ली अंगड़ाई
बहु आयामी क्रांति के दौर में
ज्ञान विज्ञान की कई नवीन धाराएं आई
और तुम्हारी मति से यह धूल नहीं हट पाई
कि यह दुनिया उसकी ही हो पाई
जिसने स्वयम के श्रम पुरुषार्थ के सहारे
अपनी अलग पहचान बनाई

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