आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Tumhara Kamra

मेरे अल्फाज़

तुम्हारा कमरा

Rajendra Gupta

22 कविताएं

59 Views
तुम्हारा कमरा

पहले मैं उस कमरे में रोज़ जाता था
अब कभी कभी ही जाता हूँ
पहले भी कमरा वही था अब भी वैसा ही है
बस एसी लग गया है

वही किताबों की अलमारियाँ अभी भी हैं
पर्दे नये है पर किताबें कोई देखता नहीं हैं
वही गोल मेज़ हैं, कुर्सियाँ अधमरी सी हैं
मैं बैठता हूँ, तो भी कमरा खाली लगता है

तुम्हारी लिखी नीली डायरी अभी भी है
जब भी छूता हूँ , पढ़ता हूँ फिर पढता हूँ
पूरा कमरा ही जैसे साँस लेने लगता है
जिंदगी एक फ़िल्म सी चलने लगती है

डायरी के पन्ने आवाज़ देते हैं, बुलाते हैं
अक्षर धुँधलाने लगते हैं, मैं सुस्ताता हूँ
लगता है पुरानी कुर्सी पर तुम ही बैठे हो
मेरे रुप में, और मुझको पुकार रहे हो

19/05/2019

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!