उलझन

                
                                                             
                            यूँ तो दुनिया के लिए सुलझे हुए हैं।
                                                                     
                            
जाने क्यों फिर खुद में यूँ उलझे हुए हैं।।

अपनेपन की थी खुशफ़हमियाँ तमाम।
गैरों के ज़रिये ये क्या मसले हुए हैं।।

उनके थे मक़सूद सारे काम अपने।
अब मगर सब उनके ही मौके हुए हैं।।

बंद रहते हैं आजकल कमरे मे दिनभर।
चाँदनी रातों में यूँ झुलसे हुए हैं।।

अब नहीं मसरूफ खाली बैठे हैं।
वक़्त के मंज़र क्यों ठहरे हुए हैं ।।

हो गये अंजाम एकबार फिर हम।
ऐतबार के बाज़ार मैं निकले हुए हैं।।

जो सजे थे फूल उसकी सेज पर।
सुबह तक वो फूल सब बिखरे हुए हैं।।

ख़त्म हो गए अब वो सारे राबिते।
अब क्या बचा ये कौन से मसले हुए हैं।।

स्याह हो जाएं ना चेहरे काजल से ।
दिल के तूफ़ान पलकों पे ठहरें हुए हैं।।

चल पढ़ेंगे जल्दी अब ना देर होगी।
राज़ी की रुखसत को वो तड़पे हुए हैं।।

राजीव कुमरिया राज़ी

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1 year ago
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