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मेरे अल्फाज़

घर...

Rajeev Hundoo

2 कविताएं

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दीवारें तो खड़ा कर लेता है हर कोई
घर बसना ही तो मुश्किल है।
चार दीवारों से बना कमरा
ऊपर से एक छत
तब घर बन जाता है
जब परिवार आ के रहता उसमे
खिड़की से झांकते परदे के पीछे से
बच्चों की किलकारी जब सुनती है
माँ, बाबू जी के कदमो से अंगना जब गूंजती है
तब वह कमरा घर बन जाता है।
रोज़ सवेरे फेरी वाला
जब आवाज़ लगता है
दूध वाले से बहु की खटपट
धोभी से गिनती की कटकट
क्या लाना है, क्या ले जाना है
आवाज़ों के बीच
वह कमरा घर बन जाता है।
होली रे रंगों से घुली
दिवाली पे सफेदी से धुली
छत पे सजी दीयों की जगमगाहट
पटाखों की गूँज के बीच
तब वह कमरा घर बन जाता है।

राजीव

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