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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल: ऐ मेरे दिल

Raj Shekhar

29 कविताएं

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ऐ मेरे दिल अभी भी तू, उसी से प्यार करता है।
उसे पाने को दुनिया से भी, तू तकरार करता है।

ज़रा इतना बता दे मेरे दिल, ये कैसी उल्फ़त है।
वो गर इज़हार करती है, तो तू इनकार करता है।

कोई गर नाम ले उसका, या ना लेता हो महफ़िल में।
तू अपने हर किस्से में उसकी, चर्चा बेशुमार करता है।

मुहब्बत भी नहीं है कम, किसी फन से ऐ मेरे दिल।
मगर फन को तो बस केवल, इक फनकार करता है।

ऐ मेरे दिल लगा दी तूने, कैसे बंदिशें खुद पर।
कि जिसके इश्क़ में डूबा, उसी से तकरार करता है।

इक शायर कह गया है सुनलो, इस दरिया की धार उल्टी है।
जो उतरा वो इसमें डूबा, जो डूबा वो पार करता है।

जो हो मालूम सच्चाई, इसकी गहराई कितनी है।
दरिया ये इश्क़ का है, इसको तू कैसे पार करता है।

-राज शेखर भट्ट, देहरादून

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