चुनाव

                
                                                             
                            अभी अभी आई नई दुल्हन सरकार देख रहे हैं
                                                                     
                            
उतरी नहीं अभी पांव् में लगी माहवार देख रहे हैं

फुर्सत नहीं है अभी चढ़ा है जीत का नशा
बधाइयों के तांतों से घर गुलोगुलजार् देख रहे हैं

योजनाएं बनती बिगड़ती लुढ़क रही हैं ढाल पर
दौलत नहीं है पास चारों तरफ उधार देख रहे हैं

काम हो रहे हैं सिर्फ टेंडरों की जानिब से
अपनों की तरफदारी से तरक्की का

लूटता पिटता बाजार देख रहे हैं
मंहगा भोजन, स्वास्थ्य, सफर हर तरफ मंहगाई की मार

जनता के झूठे हितैशी बने ये राजनेता
बनिए की तरह शुद्ध व्यापार देख रहे हैं

राज, पांच साल सोये रहे मांद में बेफिक्र हो कर
चुनाव का बजा बिगुल तो ये आदमखोर
उठकर अपना अपना शिकार देख रहे हैं।।

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3 years ago

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