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मेरे अल्फाज़

निष्पक्ष कवि

Rahultiwari Dhananjairahul

19 कविताएं

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जब लेखनी निष्पक्ष हो,पक्ष बिपक्ष से विमुख हो।
जिसकी कविता में जन मन गन की आवाज़ हो।
लेखनी में शब्दों का वार हो, संघर्ष का उत्साह हो।
स्याही खुद की हो, विचार अंतर्मन का हो।
कविता में गुणगान अन्नदाता का हो।
सीमा पर लड़ते सैनिक हो।
ब्यंग्य हो तो सब पर हो..
क्या अपने हो क्या पराए हो।।
फिर चाहे नाम क्रांतिकारी हो या चाटुकारी हो।
कुछ पर तुम भी मौन हों कुछ पर हम भी मौन हैं।
फिर इस स्वार्थ भरी दुनिया में ..
तुम निर्दोष कैसे हम गुनहगार कैसे ?
तुम जनता की आवाज कैसे ?
हम सत्ता की आवाज कैसे ?
तुम मौन हो घर में हुई करतूतों पर..
हम मौन है राष्ट्र में हुई करतूतों पर।।
अंतर बस इतना है हम में तुम में..
आप को दस वर्ष लगे क्रांतिकारी बनने में।
हमे पांच वर्ष लगे चाटुकारी बनने में।।
कवि निष्पक्ष हो,लेखनी निष्पक्ष हो।
कविता में आवाज जनतंत्र की हो।
शब्द लोकतंत्र का हो।
उदघोष राष्ट्र का हो, विजय भारत की हो।।





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