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मेरे अल्फाज़

ये ठंडी पुरवाई

rahul uniyal

4 कविताएं

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कहां से आ धमकी आज ये ठंडी पुरवाई
तारे सो गए सब ओढ़ बादलों की रजाई

ये लोग जो बात न करते थे क्यों इकट्ठा होने लगे हैं शहर में,
हाथ सेंकने को किसी ने बस्तियां तो नहीं जलाई।

इश्क़ की ये कैसी पहेली आयी ज़िन्दगी में,
न कोशिश तूने की और न मैंने सुलझाई।

उलझनें छुपाकर, धुएं उड़ाकर, खामोशी में गुजर जाती है अब शाम,
और एक दिन वो थे जब आसमान में आती थी परियां, जब आंगन में लगती थी चारपाई।

एक ये दिन है कि वो सामने से नजर चुरा कर निकल गए,
एक वो दिन था की प्यार किसे ज्यादा है इस बात पर भी होती थी लड़ाई।

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