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मेरे अल्फाज़

मृत्यु भोज एक कुप्रथा 

Rahul Singh

6 कविताएं

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मृत्यु भोज एक कुप्रथा 



मै मूरख अज्ञान साथियो हमें न दोष लगइयो ।

धर्म यही कहे रहा तुम्हे तुम मरे न भोजन खइयो ।।

बड़े दुक्ख की बात साथियो कविता सुनो हमारी ।

चली गई स्वर्ग धाम हमारे होरी की महारी ।।

फूंकिदयी सम्पदा पुरानी इतनी करी दवाई ।

पैसा रहो न पास हमारे बहुत मुसीबत आई ।।

काम काज करिदेउ परोसी अपनी अपनी ताने ।

इसी बात पर लई लेखनी कविता लगे बनाने ।।

कौन बेद मा लिखी तेरही सो तुम हमे बतइयो ।

धर्म यही 

जिनके घरमा पुत्र शोक से बिलखि रही महतारी ।।

गइया सी डकराइ पति बिना रोवे बिधवा नारी ।।

मूड पकडि के बहना रोवे करना करिके भइया ।

बड़े दुक्ख से माता रोवे घरमा मची हदैया ।।

एक ओर कोहराम मचो है ठौरइ चढ़ी करहैया ।

तहूं अधर्मी मानत नाहीं हैं बेशरम खबैया ।।

बूढ़ो पिता द्वारे बिलखै घर मे रोवै माता ।

तिनके घर मे बैठि मूर्खों भोजन तुम्हें सुहाता ।।

राजाराम लेखनी लेकर कविता रोज बनइयो ।

धर्म यही कहे रहा साथियो मरे न भोजन खइयो ।।।।



अंधविश्वास का जड़ से विनाश हो।
मनुष्य बुद्धिमान तथा विज्ञान वादी हो।

साधु । साधु ।। साधु ।।।



शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा ग्राम खदिया नगला ।।

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