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Ghar- Galiyara

मेरे अल्फाज़

घर गलियारा

Raghubir Singh

5 कविताएं

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छोटी सी उम्र में सब पीछे छोड़ आया ,
यार-दोस्त,खेत-खलियान,घर-गलियारा!

ढलती उम्र हो चली फिर एक बार खयाल आया,
कहां रह गए बोह यार-दोस्त,खेत-खलियान,बोह घर-गलियारा!

चल पड़ा मन में हसरत लिए मिलने उन यारों से,
चाहत थी एक बार फिर दौडूं उन खेत-खलियान, गलियारों से!

सब कुछ वहां बदल चुका था,
खेत-खलियान बंट चुका था!
यारों की जगह अनजाने थे,
अपने भी अब बेगाने थे!

परिवर्तन संसार का नियम है "रघुबीर" मान ले इसको,
जो आया है सो जायेगा जान ले इस को!

यही सोच कर मन को फिर आज समझाया है,
फेर-बदल सब कुदरत का खेल संतो ने फरमाया है!

- रघुबीर सिंह

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