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Yah Bhi Beet Jayega

मेरे अल्फाज़

यह भी बीत जाएगा

Raghavendra Shukla

6 कविताएं

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यह भी बीत जाएगा, बंधु!
निशा अंत है नहीं, दिवस का,
केवल है विश्राम, निरंतर-
है गतिशील समय रथ पहिया,
पूरब कल होगा हस्ताक्षर।
धीरज- आशा- कर्माभिलाषा,
किस्मत से हिम्मत की भाषा-
से, इस भाग्यबन्ध जगती में
भाग्यातीत पायेगा बंधु!
यह भी बीत जाएगा, बंधु!

कदम-कदम पर भय का साया,
मंजिल तक क्या पहुंच सकेंगे?
घनी रात, अनजाना पथ है,
पांव थकेंगे! नहीं थकेंगे?
तोड़ेंगे अब कारा क्या है?
अब आगे भी चारा क्या है!
गिरि से उलझेगा कैसे जब
कण से भीत जाएगा, बंधु!
यह भी बीत जाएगा, बंधु!

यह जो हाहाकार निशा है,
यह जो विपद अंधेरी है,
कुछ भी स्थिर नहीं है, भाई!
समय-समय की फेरी है।
धीरे-धीरे ही पर बढ़ना।
एक-एक ही, पर सीढ़ी चढ़ना,
उपक्रम हार भले ही जाए,
तू तो जीत जाएगा, बंधु!
यह भी बीत जाएगा, बंधु!

-राघवेन्द्र

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