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मेरे अल्फाज़

गजल - सोचता हूँ कभी वो भी देखती होगी निगाह भर के हमें

radhe singh

25 कविताएं

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सोचता हूँ कभी वो भी देखती होगी निगाह भर के हमें,
बस यूही नज़रे चुरा लेती है जब हम देखते है ।
निगाहे मिले तो जज्बातो की जुवा हम भी देंखे,
वो बस निगाहे छिपा लेती है जब हम देखते हैं।

उनके आहट से धरकने बढ़ जाती है दिल की,
पर वो अनजाने सी निकल जाती है जब हम देखते हैं।
अपने चिलमन में भी आती है वो कभी कभी,
पर परदे गिरा लेती है जब हम देखते है।

बहुत जदोजहद से ये पैगाम भेजा मैंने,
निगाहे दो पल बस मिला लो जब हम देखते है।
ये इश्के मजनू की बेताबी का कुछ तो सिला होगा,
वो इशारे में ज़माने को दिखाती है जब हम देखते है।

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