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मेरे अल्फाज़

घुट जाता है दम

Rachna Saxena

115 कविताएं

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पीने से प्यास नहीं बुझती,
घुट जाता है दम,
उगलने से बुझती है आग,
पर जलते हैं हम।

कश्ती किस ओर चले,
सोचती हूँ जब मैं,
उलझ जाती वे पतंगे,
खींचती जो डोर मैं
हवाओं के रुख से,
अपरिचित हूँ मैं,

भीग जाती हैं पलकें,
न भीगते हैं हम
पीने से प्यास नहीं बुझती,
घुट जाता है दम।

कदमों को बढ़ने से मतलब,
चलती ही रहूंगी,
दोराहों पर भटकूंगी जब-जब,
सभंलती ही रहूंगी,
लहरों को निहारती हुई
आगे बढ़ती हूँ मैं,

बह जाता है काजल सब,
अचम्भित रह जाते हम,
पीने से प्यास नहीं बुझती,
घुट जाता है दम।

कशिश रह जाती है कोने में,
और पड़ते हैं छाले,
जलन ऐसी जो न रोने से,
दाग दिखते हैं काले,
कमल ढ़ूंढ़ने को प्रेम का,
छटपटाती हूँ मैं,

अक्सर खुद को खो जाने से,
डर जाते हैं हम,
पीने से प्यास नहीं बुझती,
घुट जाता है दम।

-रचना सक्सेना
इलाहाबाद(उ०प्र०)


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