आपका शहर Close
Kavya Kavya
Hindi News ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Ghut jati hai dam

मेरे अल्फाज़

घुट जाता है दम

Rachna Saxena

69 कविताएं

52 Views
पीने से प्यास नहीं बुझती,
घुट जाता है दम,
उगलने से बुझती है आग,
पर जलते हैं हम।

कश्ती किस ओर चले,
सोचती हूँ जब मैं,
उलझ जाती वे पतंगे,
खींचती जो डोर मैं
हवाओं के रुख से,
अपरिचित हूँ मैं,

भीग जाती हैं पलकें,
न भीगते हैं हम
पीने से प्यास नहीं बुझती,
घुट जाता है दम।

कदमों को बढ़ने से मतलब,
चलती ही रहूंगी,
दोराहों पर भटकूंगी जब-जब,
सभंलती ही रहूंगी,
लहरों को निहारती हुई
आगे बढ़ती हूँ मैं,

बह जाता है काजल सब,
अचम्भित रह जाते हम,
पीने से प्यास नहीं बुझती,
घुट जाता है दम।

कशिश रह जाती है कोने में,
और पड़ते हैं छाले,
जलन ऐसी जो न रोने से,
दाग दिखते हैं काले,
कमल ढ़ूंढ़ने को प्रेम का,
छटपटाती हूँ मैं,

अक्सर खुद को खो जाने से,
डर जाते हैं हम,
पीने से प्यास नहीं बुझती,
घुट जाता है दम।

-रचना सक्सेना
इलाहाबाद(उ०प्र०)


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Other Properties:

Your Story has been saved!