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मेरे अल्फाज़

क्या ये काफ़ी नहीं था ?

R Mohan

12 कविताएं

67 Views
कुछ बातें और चंद मुलाकातें
एक अजनबी शहर फिर भी
तेरी मेरी वो हशीन राते
क्या ये काफी नही था ?!

खामोश सी वो डरावनी राहें
हर कदम पर नाजुक सी आहें
फिर भी तेरी बाहों में मेरी बाहें
क्या ये काफी नही था ?!

मेरा शातिर सा मन
और तेरा वो भोलापन
दो दिलो में फिर
भी इतना अपनापन
क्या ये काफी नही था ?!

तेरी शरारत भरी नादानी
मेरी हर भूल मेरी हर मनमानी
फिर भी तो हमने
प्यार करने की ठानी
क्या ये काफी नही था ?!

याद है तुझे बारिश का वो दिन
कैसे काटा था मैं ने जब तेरे बिन
तू आयी नही फिर भी
राते कर दी थी मैं
ने हर बूंदे गिन गिन
क्या ये काफी नही था ?!

तेरी पुरानी रस्मे मेरी नई कसमे
कुछ न था आसान
कुछ न था बसमे
फिर भी तेरी मेरी आँखों मे
प्यार के वो चश्मे
क्या ये काफी नही था ?

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