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मेरे अल्फाज़

वन में एक सपेरा आया

Professor Ravindra Pratap Singh

80 कविताएं

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वन में एक सपेरा आया


वन में एक सपेरा आया
मूंछ हिलाकर बीन बजाता
उसकी मूछों में कुछ जादू
सांप नागिनें बेहिच नाचें ।

वह बस बच्चों से बातें करता
उनकी लचक चुराने आया
चुरा छिपा कर झोली भरता
मन इनका ले जाने आया।

फंसा दिया लटकों झटकों में
युवा, प्रौढ़ , बूढ़े साँपों को
मत की मदिरा मस्त हो रहे
कामुक लोभों में गिरे पड़ रहे ।

वैसे मान गए क्या करतब
कैसे इनके दर्शन मक़तब।

इनका विष तो शुद्ध गरल है ,
इसमें अपना द्रव्य मिला कर
देखो क्या का क्या कर देगा
ये तो वन के नाग सरल थे
वन में रह प्राकृतिक जीवन!
सुन कर बीन जपेंगे संस्कृति
कैसे देखो बौरायेंगे !
कहते हैं होगा आमेलन
पर कैसा होगा आमेलन
विष को अपना कर पायेंगे
या फिर मूछों के प्रभाव में
अनियंत्रित ये भी हो जायेंगे ।

प्रकृति अंश विष भी है उतना
जितना अमृत है
सब की नियति और स्थिति है,
सब के स्थायी मान नियत हैं ।
क्या सोच रही सर्पीली मूछें
क्या सोच रहे ये नन्हे बच्चे
इनके माता पिता बंधु सब
सोच रहे क्या क्या पायेंगे
बस कह पायेगा नया सवेरा ।


प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह


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