आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   UJAS

मेरे अल्फाज़

उजास

Professor Ravindra Pratap Singh

74 कविताएं

20 Views
उजास

आपसे होकर उठे,
मन का हटा उजास।
तब तो कुछ कह सकें हम
कुछ तो किया प्रयास ।

कई बार देखा सुना
करते कई प्रयास
जैसा औरों के लिए
इधर भी वैसी आस ।

सम्यक चिंतन ही सही,
इधर उधर पर खेद।
नहीं न्यायसंगत यहाँ
जो कर रहे विभेद ।


प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Disclaimer


हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।
Agree
Your Story has been saved!