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मेरे अल्फाज़

छोड़ो उत्सवधर्मी होना

Professor Ravindra Pratap Singh

74 कविताएं

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छोड़ो उत्सवधर्मी होना

उत्सव होते ही रहते हैं
भारी भरकम शुल्क समेटे ,
आये दिन संस्कृतियां बिकतीं
साहित्य , कला की बोली लगती ।

अस्थि निकालें, कलम बनायें
अवयव फैला पृष्ठ पसारें
ह्रदय धमनियां स्याही करके
स्वांसें उच्छ्वास बन जायें।

फिर भी मर्म कहाँ से बदलें ,
'संस्कृति' की बोली लगती है
आये दिन बिकती रहती है ,
वैसा शुल्क कहाँ से लायें!

सब कुछ एक साधना कृति है,
आत्मा की ही ये अनुकृति है
छोड़ो उत्सवधर्मी होना,
जिसको जाना है वो जाये।


प्रोफेसर रवीन्द्र प्रताप सिंह

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