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मेरे अल्फाज़

खरबूजे

Professor Ravindra Pratap Singh

74 कविताएं

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खरबूजे


खरबूजे थे रंग बदलते
देख देख कर स्वजनों को
कभी प्रेम फिर कभी शिकायत
खरबूजे भी करते थे।

हम भी खरबूजों के जैसे
अक्सर होते मिलते थे
अपनों के संग पाकर हमको
लोग यही कुछ कहते थे।

कृत्रिमता छम छम कर आकर
जड़ चेतन में ऐसी छायी
रंग व्यथित व्याकुल अंदर ही
मन में ठूंसे बंधन भारी।

रंग बदलना चाहें भी
खरबूजे हैं पर बेचारे
हम भी कैसे रंग उड़ाएं
खांचों की गति से हैं हारे।

प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह


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