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मेरे अल्फाज़

कह दो संजीदा लोगों से

Professor Ravindra Pratap Singh

54 कविताएं

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कह दो संजीदा लोगों से

जिन्दा हैं तो कहते हैं
मिलते जुलते रहते हैं
जिन्दा हैं तो हरकत है
कोई मुर्दा थोड़े हैं ।
कह दो संजीदा लोगों से
कुरदरत की दी हो तो अच्छा है
ऐसे ओढ़ लिए बैठे हों
इसे हटायें
क्यों ओढे टेढ़े ऐंठे से
झटक तमाशा जीते जायें
जैसे भी हैं चलते जायें
जैसे भी हैं चलते जायें !
क्या औरों में टाँग अड़ाना
अपना रस्ता आना जाना !
झटक तमाशा जीते जायें
जैसे भी हैं चलते जायें।

प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

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