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मेरे अल्फाज़

खुली आँखों से देखा मैंने

Priya singh

2 कविताएं

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महिला जो कि एक सख़्त और सरल किरदार निभाती आयी है
किस तरह से आज भी हर रोज़ डर के साये में क़ैद है
यह समाज जो औरतों को देवी का दर्जा भी देता है
और उनके पवित्र होने का फ़रमान भी माँगता है

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