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मेरे अल्फाज़

तलाश-ए-मंज़िल

Preeti Yadav

1 कविता

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अभी तो फर्श से अर्श तक का सफर तय करना है,
परिस्थितियों से लड़ कर हर मैदान फतेह करना है।
इन संघर्षों में पलकर कल सूर्य सा चमकना है ,
"मंजर-ए-मन्ज़िल" से पहले कहीं ना भटकना है।
अभी तो फर्श से अर्श तक का सफर तय करना है।।

खुद पर किंचित भी अभिमान नहीं मुझे,दृढ़ विश्वास है,
दिल में कुछ बड़ा कर गुजरने की एकमात्र प्यास है।
हौसलों से बुनी हो जब मंजिल तक पहुँचने की आस,
फिर कहाँ दिल होता है,कभी भी इन ठोकरों से निराश।
बस करना होता है हर घड़ी मंजिल तक पहुँचने का निरंतर प्रयास।।

खवाबों को जमीं पर अपने हौसलों से उतारेंगे,
"मंजर-ए-मन्ज़िल"से पहले हार नहीं मानेंगे।
तपते रहेंगे ख्वाबों की तपिश में एक उफ़ भी ना करेंगे,
आज आम है तो क्या हुआ कल इस तपिश से "स्वर्ण" बनके ही निकलेंगे।
"मंजर-ए-मन्ज़िल"से पहले बस हार नहीं मानेंगे।।



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