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मेरे अल्फाज़

सबसे मिलना सब में हंसना ग़म कोई ना पढ़ने पाए

Praveen Rai

27 कविताएं

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सबसे मिलना सबमें हंसना ग़म कोई ना पढ़ने पाए
न हो खबर किसी को हमने पीछे ख़ंजर कितने खाये!!

फ़ौलाद बने हम हर लोहे को हमने काटा है
ख़ंजर वो ना झेल सके जिसको अपनो ने पाटा है
जीती दुनिया पर हार गए जब अपने ही लड़ने आए !
सबसे मिलना सबमें हंसना ग़म कोई ना पढ़ने पाए !

हैरां है ग़म कितना हम और सितम अब झेलेंगे,
अन्दाज़े हंसी ना छूटेगी ऐ ग़म आंख मिचौली खेलेंगे !
दिल की फिर तमन्ना कि उनकी आरज़ू में मर जाएं !
सबसे मिलना सब में हंसना ग़म कोई ना ये पढ़ने पाए !


-- Praveen Rai


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