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मेरे अल्फाज़

एक तारा जो सूर्य भाँति था चमक रहा !

Praveen Rai

32 कविताएं

279 Views
!एक तारा जो सूर्य भाँति था चमक रहा !

एक तारा जो उदित हुआ सूर्य भाँति था चमक रहा
दीप्तमान हो नभ से है अब आकाश में दमक रहा

‘काई पो शे’ आरम्भ हुआ यह ‘शुद्ध देशी रोमांस’,
‘ब्योमकेश’ और ‘धोनी’ करके पी डाला हालांश
ज़िंदगी जैसे हुयी ना पूरी वैसे ‘बुलबुल’ रही अधूरी
छोटा सा था ‘राबता’ पर दिल में था धड़क रहा!
एक तारा जो उदित हुआ सूर्य भाँति था चमक रहा

चाहे तुमने कर दिया हो ‘वेल्कम टू न्यूयॉर्क’
तिरस्कृत किया है कतिपय ने बस यही व्यथार्थ
इसको इतने मिले ‘छिछोरे’ षड्यंत्रो से इसको छोड़े,
किंतु हमको नहीं था भान कितना अंदर था दहक रहा!
एक तारा जो उदित हुआ सूर्य भाँति था चमक रहा

‘केदारनाथ’ को छूकर तुमने आभामंडल का ओज लिया
दिव्य दीप्त हो अल्प समय में जग को है आलोक दिया !
‘सोन चिरैया’ की कल कल से यह सबका मन मोह रहा
‘ड्राइव’ किया खुद से खुद को गुलशन सा था महक रहा
एक तारा जो उदित हुआ सूर्य भाँति था चमक रहा !!

‘दिल बेचारा’ ढूँढे जिसको देख हर इक था बहक रहा
एक तारा जो उदित हुआ फिर , सूर्य भाँति था चमक रहा
दीप्तमान हो अब नभ से भी है और धरती पर दमक रहा !!

-प्रवीण राय
Vidisha MP


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