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मेरे अल्फाज़

मैं और मेरी तन्हाईयाँ

Praveen Pratap

21 कविताएं

112 Views
''मैं और मेरी तन्हाईयाँ ''
मैं और मेरी तन्हाईयाँ अक़्सर बातें करते हैं ,
आसमाँ में टिमटिमाते हुए तारों के साथ ,
सूरज की उगती हुई किरणों के साथ ,
सुबह पंछियों की चह -चआहट भरी आवाज़ों के साथ,
सुबह उठते हुए आलस्य भरी अँगड़ाई के साथ ,
मैं और मेरी तन्हाईयाँ अक़्सर बातें करते हैं ,
नदी की चलती हुई धाराओं के कल -कलाहट भरी आवाज़ों के साथ ,
रेगिस्तान में चलती हुई हवाओं के साथ ,
बारिश में गिरती हुई पहली बूँदों के साथ ,
ठण्ड में चलती हुई सिहरन भरी हवाओं के साथ ,
मैं और मेरी तन्हाईयाँ अक़्सर बातें करतें हैं ,
जीवन की अभिलाषाओं के साथ ,
दौड़ती भागती ज़िन्दगियों की सोच के साथ ,
रिश्तों में बढ़ती दूरियों के साथ ,
हर समय कुछ पा लेने की चाहत के साथ ,
दूसरों से आगे ,निकलने की चाहत के साथ ,
मैं और मेरी तन्हाईयाँ अक़्सर बातें करतें हैं ,
मरती हुई अपनी इन्सानियत के साथ।

प्रवीण प्रताप गोरखपुर

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