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मेरे अल्फाज़

वो तुमने जो सपने दिखाए थे

Prasad Chaubey

7 कविताएं

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सुनो
वो तुमने जो सपने दिखाए थे
वो अब भी तैरते हैं मेरी पलकों पर
अन्धेरी स्याह रातों में
अकेले कमरे के भीतर ।
सुनो
तुम्हारा चेहरा अब भी तैरता है मेरी आँखों में
कि कुछ भी दिखता ही नहीं
तुम्हारे बाद अब इनको
कि इनकी रौशनी थे तुम।
सुनो
वो जैसे रास्तों को पार करते
पकड़ लेते थे मेरी बाहें तुम
वैसे अब कोई नहीं करता ।
सुनो
वो तुम्हारा घूरना,पलकें झुकाना
हलके से मुस्काना
वो मंज़र याद आते हैं ।
सुनो
वो जो तुमने बनाये थे
कवर के पेज
मेरी फाइलों में लगाने की खातिर
जो मैंने फ्रेम करवाए थे तुमसे छिपाकर
मेरी दीवार पर अब भी लटकते है
कभी आकर ज़रा देखो ।
सुनो
मेरी ये जागती बेचैन सी रातें
और सोते हुए अलसाये से बेमानी से ये दिन
जिन्दगी जीने की इस जद्दोजहद के बीच
सुनो
तुम याद आते हो,
तुम बहुत याद आते हो .....

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