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baat kuch aur thi

मेरे अल्फाज़

बात कुछ और थी

Pranshu Prashant

4 कविताएं

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बूंद भर बारिश हुआ हो जेसे
धूंध अभी अभी उड़ा हो जेसे
मैं मरू की रेत सा सूखे जा रहा हूँ
कुछ पल बरस जाते कुछ पल ठहर जाते
तो बात कुछ और थी 

रूठे रूठे लहर मानो इक जंग छेड दी जेसे
रेत की बनी टीले बिखेर दी जेसे 
मैं किनारा डूबे जा रहा हूँ
कुछ पल थाम लेते कुछ पल रोक लेते
तो बात कुछ और थी 

जुगनू ने चाँद समझा दिये को जेसे 
उस फलक पर रोशनी कुछ खुश नुमा थी 
जुगनू चाँद पर जले जा रहा हूँ
और जलता तुम्हारे खातिर
तो बात कुछ और थी

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