दिल की सूनी बस्ती

                
                                                             
                            दिल की सूनी बस्ती में,
                                                                     
                            
मैं अक्सर गुम हो जाता हूं।
तुम गज़लों में ढल जाती हो,
मैं शब्दों में खो जाता हूं।

दिल की सूनी बस्ती में ,
मैं तुझको बुनते रहता हूं,
सपने को गढ़ते रहता हूं।
मैं फूट-फूट कर रोता हूं,
जब निपट अकेला होता हूं।

दिल की सूनी बस्ती में,
कुछ सपनों को आकार मिले।
कुछ अपनों का स्वीकार मिले,
मैं तेरी गोद में सो जाऊं।
बस मुझे प्यार-ही-प्यार मिले,
मैं यही सोंचता रहता हूं।
फिर मन ही मन घबराता हूं।

दिल की सूनी बस्ती में,
कब राधा को भी श्याम मिले।
कब पतझड़ में भी फूल खिले,
ये प्रेम की पावन गालियां हैं।
जो चला उसी को शूल मिले,
मैं तो सावन का प्यासा।
बस अपनी प्यास दबाता हूं,
दिल की सूनी बस्ती में।
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1 month ago
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