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Kasak

मेरे अल्फाज़

कसक

Prakash Ranjan

25 कविताएं

23 Views
विचारों का अंतरद्वंद
वो मीठी सी कसक
भावों का अतिरेक और
धडकनों का शोर

अंतर्मन को छेदती हुयी
कजरारी शो़ख आंखें
मंत्रमुग्ध करती हुयीे
स्निग्ध सी मुस्कान
कानों मे रस घोलती
पाजेब की रूनझुन
और नथुनों में समाती
तन-मन को सिहराती
वो मादक सी देहगंध

तुम्हारा निश्छल प्रेम

सब बहराना चाहती है
बनकर एक प्यारी सी कविता
कोई कालजयी महाकाव्य
जिसके हर अक्षरों सब पन्नों मे
मुस्कुराता हो तुम्हारा चेहरा
पर डरता हूं लोग कही
उन आड़ी-तिरछी-बेजान लकीरों मे
निहित कोई अर्थ ढूंढेंगे और
खारिज कर देंगे मेरी 'प्रेमकविता'
मेरे असफल प्रेम की तरह

- प्रकाश रंजन 'शैल' पटना

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