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Kasak

मेरे अल्फाज़

कसक

Prakash Ranjan

22 कविताएं

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विचारों का अंतरद्वंद
वो मीठी सी कसक
भावों का अतिरेक और
धडकनों का शोर

अंतर्मन को छेदती हुयी
कजरारी शो़ख आंखें
मंत्रमुग्ध करती हुयीे
स्निग्ध सी मुस्कान
कानों मे रस घोलती
पाजेब की रूनझुन
और नथुनों में समाती
तन-मन को सिहराती
वो मादक सी देहगंध

तुम्हारा निश्छल प्रेम

सब बहराना चाहती है
बनकर एक प्यारी सी कविता
कोई कालजयी महाकाव्य
जिसके हर अक्षरों सब पन्नों मे
मुस्कुराता हो तुम्हारा चेहरा
पर डरता हूं लोग कही
उन आड़ी-तिरछी-बेजान लकीरों मे
निहित कोई अर्थ ढूंढेंगे और
खारिज कर देंगे मेरी 'प्रेमकविता'
मेरे असफल प्रेम की तरह

- प्रकाश रंजन 'शैल' पटना

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