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मेरे अल्फाज़

सिपाही का दर्द

Pradosh Singh

8 कविताएं

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धरम तुला पर मैं
खुद को तौल रहा हूँ
मुवाफ कीजिएगा,
सिपाही बोल रहा हूँ ॥
गहन निशा के अंधेरों में
दिन के तल्ख उजालों में,
जहाँ पुकारा दौड़ के आए
जख्मी पैर के छालों में ,
दिल के टांके खोल रहा हूँ
मुवाफ कीजिएगा
सिपाही बोल रहा हूँ ॥

होली हो , दिवाली हो या
बजती कंही अजान हो,
सावन के गीत सुहावन हो
या रोजा हो रमजान हो,
कंही पुकारे मा कोई या
बहना का अपमान हो,
लाज ना जाए वर्दी की
इसलिए दौड़ रहा हूँ
मुवाफ कीजिएगा
सिपाही बोल रहा हूँ ॥

शामे अवध यूँ सुहानी ना होती
गर कुर्बान हमारी जवानी ना होती
तहजीब सारी मिट गयी होती
फिजां में खुशी की रवानी ना होती
खूँ से सनी हर तहरीर होती
बूढ़े कंधो पे बोझ-ए-जवानी होती
आँखे खुशी को तरस गयी होती
गर वर्दी हमारी निशानी ना होती
एक 'गोली' का बोझ ढो रहा हूँ
मुवाफ कीजिएगा
सिपाही बोल रहा हूँ ॥ ॥

(प्रदोष सिंह)

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